Monday 19 July 2010

धर्म व मन की पवित्रता

             जो धर्म मन की पवित्रता का सन्देश न देकर लोगों को एक दूसरे से लडने झगडने के लिए बाध्य करे, उसे धर्म कहना किस हद तक उचित होगा ? संसार के समस्त धर्म , चाहे वह हिन्दू धर्म हो या मुस्लिम धर्म, बौद्ध हो या जैन, सिख हो या इसाई- निर्विवाद रूप से एक ही बात पर जोर देते हैं- वह है मन की पवित्रता . वास्तव मे धर्म व अधर्म की इससे व्यापक और उत्कृष्ट  कौन सी परिभाषा हो सकती है जो तुलसीदास जी ने अपने रामचरितमानस मे दी है  - परहित सरस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई . धर्म का मूल ही 'सर्वभूतहित' है और धार्मिक व्यक्ति की पहचान 'सर्वभूतहितेरत'  है .
                      सच कहें तो, मुझे ऐसा लगता है की,  हजारों मे कोई एक ही ऐसा होता है, जो वास्तव मे धर्म को तत्त्व से जानता हो . बाकी लोग तो धर्मांध हैं. कोलंबस जैसे मरते वक्त भी ये नहीं जान पाया था कि उसने भारत नहीं, अमेरिका खोजा है, भारत तो अभी भी बहुत दूर है, उसी प्रकार मरते वक्त भी कई लोगों को ये पता  नहीं चलता होगा की उन्होने अब तक धर्म रूपी भुजंग की केंचुली ही पायी है, धर्म रूपी भुजंग तो अभी भी बहुत दूर है.  यही धर्म की विडम्बना है या कहिये की मानव की विडम्बना है . इस विडम्बना से इंसान निकले तो निकले कैसे?  मुझे लगता है की सबसे उत्तम मार्ग आत्मपरिष्कार ही है. इंसान आत्मपरिष्कार की साधना करे क्यूंकि जब तक व्यक्ति परिष्कृत नहीं होगा, जब तक उसके मन मे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, ईर्ष्या रूपी दुर्गुण भरा रहेगा, तब तक,  तब तक उसे धर्म के गूढ़ रहस्यों का ज्ञान हो  पाना, एक प्रकार से, असंभव ही है .
                  प्रत्येक धर्म व्यक्ति को यही कहता है की पवित्र करो स्वयं को. इसके अलावा न तो सुख प्राप्त करने का कोई मार्ग है,न धार्मिक सत्य की अनुभूतियों को जान सकने का कोई और मार्ग . पवित्र होने के बाद व्यक्ति को किसी धर्मशास्त्र की आवश्यकता नहीं रह जाती. फिर वह जो कहता है वही धर्मशास्त्र बन जाता है. जो वह करता है वही धर्म बन जाता है. जो वो सुनता है वही भजन  हो जाता  है . व्यक्ति तब ग़जल भी सुनेगा, विरह रस से परिपूर्ण या संयोग रस से युक्त कोई काव्य सुनेगा तो भी उसे यही लगेगा की मै उसी परमात्मा की आराधना कर रहा हूँ .  व्यक्ति को ये महसूस होगा की जिस प्रकार संयोग -वियोग मानवीय प्रेम का लक्षण है , उसी प्रकार का संयोग-वियोग ईश्वरीय प्रेम का लक्षण भी .
                       जब व्यक्ति 'तस्वीर बनाता हूँ , तस्वीर नहीं बनती .... ' सुनता है , तो उसे ऐसा लगेगा की वह भी एक चित्रकार की तरह ईश्वर  रूपी स्वयं के ह्रदय मे विराजमान किसी अन्तशचेतना  की तस्वीर  बनाने की कोशिश कर रहा है, और तस्वीर बन नहीं पा रही है. आज तक कोई परमात्मा की तस्वीर बना सका है भला .. शायद कोई नहीं बना पाया ... शायद सभी लोग बना पाए हैं.  ईश्वर का कोई रूप तो है ही नहीं , उसका रूप कोई बनाएगा क्या ? ईश्वर का कोई रूप ही नहीं, तो कुछ भी बना दो , क्या फर्क पड़ता है, रहेगा तो वो ईश्वर  ही .'' ईश्वर से अलग इस दुनिया मे कुछ भी नहीं. कुछ भी नहीं - जानने वाली बात सिर्फ यही है .
               ईश्वर महासागर है, हम सब महासागर की बूंदें . यदि बूंद महासागर को जानने की कोशिश करेगी , उसके ओर-छोर को जानने की कोशिश करेगी तो असफल ही होगी. इसमे संदेह का प्रश्न ही क्या है ? पर जब वही बूँद स्वयं को जान लेती है, तो वो, एक प्रकार से, महासागर को जान लेती है. जैसे एक बूँद , वैसी  ही महासागर की सभी बूंदे.  इसलिए यदि ईश्वर  को जानना हो तो स्वयं को जानना जरुरी है. जिस दिन पानी की बूँद खुद को जान जाएगी, उस दिन वो महासागर को भी जान जायेगी क्यूंकि जो एक पिंड मे है वही ब्रह्माण्ड मे है .
                            मुझे लगता है की कण कण मे भगवान  नहीं, कण-कण ही भगवान है . हमने किसी जड़ की उपासना कभी नहीं की. जब उपासना की है तो चेतन की. हम जब कण कण मे भगवान् के अस्तित्व की बात करते हैं तो उस ईश्वर रूपी चेतना के  ही समस्त ओर  व्याप्त होने की बात करते हैं. वास्तव मे जड़ और चेतन का कोई भेद नहीं है. मै जहां खड़ा हूँ , वहां से मुझे समस्त वस्तुएं चेतन ही नजर आ रही हैं, चेतना के स्तर भले ही भिन्न भिन्न हो .
                     पंथ और धर्म के नाम पर वही लड़ सकता है जिसने सत्य का साक्षात्कार नहीं किया हो, जो मंजिल तक नहीं पहुंचा हो . . मंजिल पर पहुंचे व्यक्ति को पंथों से या धर्मों से अधिक मतलब नहीं रह जाता है . मंजिल पर पहुँचने के बाद रास्तों की अहमियत ही कितनी होती है ? हाँ , तब वह उन लोगों को जो अभी भी रास्ते मे हैं, उन्हे मंजिल पर लाने का कार्य कर सकता है. जो पिरामिड के शीर्ष पर है, उसके लिए शीर्ष पर पहुँचने के सभी रास्ते बराबर हैं. वो जानता है  की प्रत्येक रास्ता शीर्ष पर पहुंचता है. कोलंबस जब पश्चिम की दिशा से बढते हुए भारत पहुंचना चाहता था तो क्या उसकी दिशा गलत थी ? नहीं , वह पश्चिम की दिशा से भी भारत पहुँच सकता था. हम नहीं कह सकते की उसकी दिशा गलत थी.  धर्म के क्षेत्र मे भी ये कहना  की  किसी धर्म की दिशा गलत है और वह  ईश्वर  तक नहीं पहुंचाएगा, ओछी बात है .
                           क्राइस्ट, गुरु नानक, कबीर, बुद्ध, कृष्ण कौन थे ? ये वो लोग थे जो संसार रूपी पिरामिड  के ईश्वर रूपी शीर्ष तक पहुँच चुके थे. यही कारण है की उन्होने कभी भी अधर्म का, घृणा का प्रचार नहीं किया, सर्वत्र प्रेम का ही प्रचार किया. धर्म चाहे हिन्दू धर्म हो,इसाई धर्म हो या दुनिया का कोई भी धर्म क्यूँ न हो, है तो वह वास्तव मे ईश्वर  तक पहुँचने का रास्ता ही. धर्म ईश्वर नहीं है, धर्म ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता मात्र है . मेरा रास्ता तुम्हारे रास्ते से अच्छा  है , ये कहना कोई बहुत अच्छी बात नहीं. जापान और इंग्लैंड -दोनों देशों के व्यक्ति यदि भारत पहुंचना चाहेंगे तो क्या आप एक ही दिशा बताएँगे ? नहीं, आप तो जानते हैं की भारत पहुँचने के लिए इंग्लैंड वालों के लिए निकटतम रास्ता पूर्व को जाता है और जापान वालों के लिए पश्चिम की और . धर्म वही निकटतम रास्ता है और जरुरी नहीं की वह सबके लिए सामान हो .
              एक समानता जो मुझे अनेक धर्मो मे मिलती है, वह है ईश्वर  को पाने हेतु पात्रता विकसित करने की बात, स्वयं को पवित्र बनाने वाली बात. काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, इर्ष्या आदि का परिष्कार  करने की बात   .ईश्वरः सर्वभूतानाम हृददेशेअर्जुन तिष्ठति. इस सत्य का साक्षात्कार वही कर सकता है जो पवित्र है. समस्त धर्म यही कहते हैं की स्वयं को पवित्र बनाओ,अपनी बुराइयों  से संघर्ष करो. और जब तुम ऐसा कर लोगे और अपनी बुराइयों  को अपेक्षित मात्रा मे दूर करने मे सफल होगे, तब ईश्वर तुम्हारे मन मंदिर मे प्रवेश करेगा . और तब सभी पंथ, सभी धर्म एक हो जायेंगे  . जब हम ईश्वर रूपी केंद्र से दूर होते हैं, तो धर्म रूपी त्रिज्याओं के मध्य भी दूरियां अधिक होती हैं. जैसे जैसे  हम केंद्र के नजदीक पहुँचते हैं, दूरियां स्वयमेव कम होने लगती हैं, और जब हम केंद्र पर पहुँचते हैं, तो सभी त्रिज्याएँ, सभी पंथ , सभी धर्म एक हो जाते हैं .
                      ईश्वर के मन मंदिर मे प्रवेश हेतु मन की निर्मलता आवश्यक है . शायद इसीलिए कहा गया है , ' निर्मल मन जन सो मोहि पावा , मोहि कपट छल छिद्र न भावा'. अतः  ये उचित होगा की हम धर्म के स्वरुप  को समझें ,स्वपरिष्करण  ओर  सर्वभूतहित पर ध्यान दें , न की धर्म का उपयोग आपस मे झगडे बढाने, वैमनस्य उत्पन्न करने व घृणा फैलाने मे .

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