Sunday 4 July 2010

अज्ञानता का दर्शन और अनंत ज्ञान

               'यदि' संपूर्ण ज्ञान को नीली व्हेल  मछली मानें ,तो मेरा ज्ञान उसके मुकाबले आज अमीबा जितना ही बड़ा है और मै अपने जीवनकाल मे लाख कोशिश कर लूँ, मेरा ज्ञान अपने जीवन के अंत मे  शायद चींटी जितना ही बड़ा हो पायेगा, उससे बड़ा नहीं.
                  शायद यही अज्ञानता का दर्शन ही इंसान को दार्शनिक बनाता है.  इंसान  अपने ''सीमित ज्ञान'' के जरिये ''अनंत ज्ञान'',  ईश्वर, प्रकृति को समझने कि कोशिश करता है और कभी पूरी तरह  समझ नहीं पाता,  न शायद  कभी समझ पायेगा.  हम अंश  हैं,  प्रकृति पूर्ण  है  और कोई अंश  अपने  पूर्ण  को जिसका वह अंश  है,  पूर्ण रूप मे समझ सकने  मे सक्षम होगा, इसमे  मुझे संदेह  है.  जब कोई अंश, कोई व्यक्ति,  ये दावा करे कि मैने पूर्ण को पूरी तरह से समझ लिया है, तो ऐसा सोचना उस इंसान कि अल्पज्ञता ही होगी. व्यक्ति को  ये कहना ही पड़ता है कि मै पूर्ण को पूरी तौर पर पर नहीं जानता, क्योंकि मै भी पूर्ण का ही अंश हूँ , उसका एक छोटा सा हिस्सा हूँ, पूर्ण को तो पूरी तरह कभी  देखा नहीं, अपूर्ण को ही देखा है, इसलिए मै पूर्ण को पूरी तरह कैसे जान सकता हूँ? सब कुछ मै नहीं जान सकता और सब कुछ जानना  मेरे लिए असंभव है. शायद यहीं से अज्ञेयवाद का जन्म होता होता है .
                व्यक्ति अपनी चेतना के द्वारा प्रकृति को जिस हद तक  जान पाता है, जितना समझ पाता है,  उसी आधार पर  प्रकृति के  ऊपर टिप्पणी करता है .व्यक्ति की चेतनाशक्ति  प्रकृति  की सम्पूर्णता का जो अंश देख पाती  है, जिस रूप मे देख पाती है, और देखने के बाद जो निष्कर्ष निकाल पाती है,  उन निष्कर्षों  का व्यक्ति के दृष्टिकोण  के निर्माण मे महत्वपूर्ण  भूमिका होती है.
                      मुझे ऐसा प्रतीत होता है की व्यक्ति रूपी अंश के द्वारा अपनी सीमित  चेतनाशक्ति के माध्यम से इश्वर-प्रकृति-सृष्टि रूपी पूर्ण को समझने के प्रयास से ही विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं का उदय होता है. विभिन्न  मतों और दार्शनिक  विचारधाराओं के मध्य विरोधाभासों का भी शायद यही कारण है . दर्शनशास्त्र मे आस्तिक दर्शन भी हैं व नास्तिक दर्शन भी . कोई कहता है की इसी जन्म मे व्यक्ति को परलोक जाने के लिए तैयारी   करनी चाहिए, तो कोई कहता है की ''यावत् जीवेत सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा घृतं  पिबेत, भस्मीभूतस्य  देहस्य पुनरागमनं  कुतः'' . कोई कहता है  वह मानवीय ज्ञान से परे है, कोई इश्वर को तर्क से ढूँढने   की कोशिश करता है . क्या ऐसा नहीं लगता की चार अंधे किसी हाथी के अलग अलग अंगों को छूकर ये बताने की कोशिश कर रहे हैं की हाथी तो खम्भे की तरह है, हाथी तो रस्सी की तरह है, हाथी तो दीवाल की तरह है या हाथी तो सांप की तरह है.  सत्य किसको मालुम है, किसी को भी नहीं. सभी आब्जेकटिवली  गलत हैं, सब्जेक्टिवली सही हैं . अंधों ने अपने स्पर्श की चेतना के द्वारा जो महसूस किया, उसे दुनिया के समक्ष रख दिया.  क्या अंधे सच बोल रहे हैं , क्या अंधे झूठ बोल रहे हैं ? क्या अंधे गलत हैं, क्या अंधे सही हैं ? यदि अंधे गलत हैं, तो क्यूँ है, अंधे सही हैं तो क्यूँ हैं?
              मुझे  कहीं न कहीं ऐसा प्रतीत होता है की    समस्त दर्शन एकांगी हैं और यदि एकांगी नहीं हैं तो अस्पष्ट  हैं .जैन दर्शन एकांगी है क्यूंकि  वह अहिंसा पर इतना अधिक बल देता है की कहीं न कहीं वह अव्यवहारिक हो जाता है . बौद्ध   दर्शन दुखों का दर्शन है . संपूर्ण बौद्ध दर्शन कहीं न कहीं इस संसार मे दुःख ही दुःख है और इस से बचने का मार्ग क्या है, ये ढूँढने  मे  लगा रहता है.  प्रायः हिन्दू दर्शन क्या यही नहीं कहता की जन्म मरण के फेर से बचने हेतु इंसान को मोक्ष प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए. मोक्ष प्राप्त करने की कोशिश क्यूँ की जाए? इसीलिए ना की जन्म मरण के फेर से बचा जा सके या भवसागर, जिसे हम दुःख का सागर कहते हैं, वहां  फिर  गोता लगाने के लिए न आना पडे.  जैन दर्शन जब स्यादवाद( शायद है भी, नहीं भी ) की बात करता है , तो क्या वो अस्पष्ट नहीं हो जाता  ? क्या वह एकांगी न होने की कोशिश करते हुए   अस्पष्ट  नहीं हो जाता है ... यह   भी है, वह  भी है, तो क्या नहीं है? यह   भी नहीं है, वह  भी नहीं है तो क्या है ?
                    मुझे  लगता है की   कई बार जब इंसान कमजोर होता है  या जब उसके पास बहुत वक्त होता है, तो वो दर्शन मे अपनी कमजोरियों का जवाब ढूँढता  है, अस्पष्ट  विचारों मे  सहारा ढूँढने  की कोशिश करता है ,कुछ प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर ढूँढने  की कोशिश करता है, (अपनी ज्ञानेन्द्रियों के सहारे, जैसे अंधे हाथी को स्पर्श करके जानने समझने की कोशिश करते हैं)  और स्पष्ट उत्तर  उसे  मिल नहीं पाते, न कभी मिल पायेंगे.  व्यक्ति की प्रकृति के ऊपर  टिप्पणियां सदैव प्रारंभिक  सर्वे पर ही आधारित होती है, अंतिम सर्वे तो वो कभी भी नहीं कर पाता. इस दुनिया मे अंतिम कुछ भी नहीं होता, सब  कुछ अनंतिम  होता है  . इसलिए मेरी ये टिप्पणियां भी   अब तक के प्रारंभिक सर्वे पर ही  आधारित है, सम्पूर्णता ( प्रकृति ) के जिस अंश को जैसा देखा है, जाना है, समझा है, उसी आधार पर मेरी टिप्पणियां हैं.  सर्वे  जारी है .
                    बहरहाल, यदि हम ये जानते हों   की हम अज्ञानी हैं, और उस अज्ञान को दूर करने की दिशा मे कदम बढाते  हैं, तो शायद हमसे बड़ा ज्ञानी  कोई  नहीं है. ज्ञानी  हमेशा जानते रहता है की वो 'बहुत  कुछ' नहीं जानता, वो लाख कोशिश कर ले, 'सब कुछ' नहीं जान  पायेगा क्यूंकि सब कुछ तो अनंत है, और जो  कुछ वो जान लेता है, वही और वहीँ उसका अंत है. अपनी अज्ञानता का ज्ञान व्यक्ति को कट्टरपंथी बनने से रोकता है . अज्ञानी व्यक्ति जानता है की 'प्रकृति तो अगाध है, असीम है, उसकी न कोई सीमा है. जिसको कहते हैं क्षितिज, वह हमारे ही वीक्षण की सीमा है.' अपनी अज्ञानता का ज्ञान व्यक्ति को विनम्र बनाता है और इमानदारी से, पूरी निष्पक्षता से किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से दूर रहकर सत्य  की खोज करने के लिए प्रेरित करता है.
                  आइये, हम भी उस अनंत ज्ञान के समक्ष अपनी अज्ञानता को ध्यान मे रखते हुए, अपनी सीमित चेतना के माध्यम से, विनम्रतापूर्वक , निष्पक्षतापूर्वक  व किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त होकर सत्य की खोज करें क्यूंकि  क्या पता कब प्रकृति हमें  अपना कौन सा नया रूप दिखाए, कब कौन सा नया ज्ञान दे और अपने रहस्य के ऊपर से कब कौन सा नया पर्दा उठा  दे- ये तो, बेशक, प्रकृति ही बेहतर जानती है.

1 comment:

  1. na janane ke bhan ke sath hi janane ki prakriya chalti hai. gyan ko suchna se alag kar dekha jana kam se kam iski thodi samajh hona jaruri hota hai. narad aur sanatkumar ki katha ka apra aur para gyan bahut had tak ise saaf kar deta hai. aise vishayo par itna vichar aur lekhan hua hai ki yah padhne padhane ka kam diary ke hisse ke liye adhik upayukt lagta hai. kintu lekhan me saiyam achchha hai/

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