Friday 18 June 2010

एक लीक काजर की

                   हमें स्वविवेक का आश्रय लेते हुए ही जीवन के फैसले लेने चाहिए, न की कागजों में लिखी हुई बातों का अक्षरशः अंधानुसरण करते हुए .अच्छे -बुरे के निर्धारण में स्वविवेक का बहुत महत्व होता है. किताबों में लिखी हुई बातों के अंधानुसरण से ये कहीं ज्यादा उचित है की हम प्रकृति प्रदत्त स्वविवेक का सहारा लें . इश्वर प्रदत्त स्वविवेक का सहारा लेकर जहाँ सत्य बोलना उचित प्रतीत होता है ,वहां सत्य बोलें ,जहाँ झूठ बोलना उचित प्रतीत होता है वहां झूठ . एक प्रश्न मेरे मन में बचपन से गूंज रहा है . मेरे शिक्षकों द्वारा मुझे दो किस्म की विरोधाभासी बातें सुनने को मिली . पहला, 'कोयले के साथ कभी दोस्ती नहीं करनी चाहिए, गर्म रहे तो हाथ जला देती है, ठंडा रहे तो हाथ काला कर देती है' . ये मथुरा काजल की कोठरी कैसो ही सयानो जाये, एक लीक काजर की लागि है पै लागी है. दूसरा, 'जो सज्जन उतम प्रकृति, का करि सकत कुसंग, चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग.' एक कहता है की दुष्टों का साथ कभी नहीं करना चाहिए, दूसरा कहता है की उत्तम प्रकृति के मनुष्य पर कुसंगति का कोई असर नहीं होता- क्या सही है, क्या गलत ?
                 दोनों बातें एक दृष्टि से भले ही विरोधाभासी लग रही हो, पर विरोधाभास है नहीं. वास्तव में शक्ति ही शक्ति को विजित करती है. यदि सज्जनता में दुर्जनता से कही ज्यादा शक्ति होगी, तो वो दुर्जनता को जीत लेगी. यदि दुर्जनता ज्यादा ताकतवर हो गई, तो दुर्जनता जीतेगी .
                जैसे पेड़ जब बहुत छोटा होता है, तो छोटी सी बकरी भी उसे खा जाती है, पर उस पौधे के बड़े हो जाने और बडे वृक्ष मे तब्दील हो जाने पर उसके तने से पचासों बकरियों को बाँधा जा सकता है . इस से वृक्ष को कोई फर्क नहीं पड़ता . सत्संगति और कुसंगति से सम्बंधित नियम भी ऐसा ही है .
;जब सत्संगति या चरित्र का पौधा बहुत छोटा होता है तो उसके आस-पास बाड़ लगाने की आवश्यकता पड़ती ही है, वर्ना कोई न कोई दुर्गुण या कुसंगति रूपी बकरी उस चरित्र रूपी पौधे को ख़त्म कर सकती है. छोटे बच्चों को कुसंगति से बचाना अत्यधिक आवश्यक है, उसी तरह जैसे छोटे पौधे को बकरियों से बचाना . एक बार सुगठित चरित्र का निर्माण हो जाने के बाद , पौधे के वृक्ष मे तब्दील हो जाने क बाद चाहे जितनी ही बकरियां आयें जाएँ , कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता .बात हमेशा सापेक्ष शक्ति की होती है . यों तो हमारे शरीर में असंख्य जीवाणु, कीटाणु, विद्यमान रहते हैं , हमारे चारों और ही न जाने कितने होंगे .पर वो हम पर तब तक असर नहीं करते जब तक हम मजबूत होते हैं . वो हम पर तभी असर करते हैं जब हम कमजोर हो जाते हैं और हमारी प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है . स्वस्थ मनुष्य छोटी -छोटी बीमारियों के धक्कों को आसानी से झेल सकता है, पर जिसको एड्स हुआ है , उसके लिए तो छोटी से छोटी बीमारी भी काल का रूप है , क्यूंकि उसकी प्रतिरोधक क्षमता ख़त्म हो चुकी है . यही बात सत्संगति और कुसंगति पर भी लागू होती है . यदि आप मे रामकृष्ण परमहंस जैसे उच्च कोटि के संस्कार हैं , तो आप वेश्याओं मे भी 'माँ' देखेंगे . आपके नजदीक आकर के कुसंस्कारी मनुष्य भी सुसंस्कृत हो जायेगा . यदि आपकी 'अहिंसा' मे ताकत होगी, तो शेर - बकरी भी एक घाट पर पानी पियेंगे . तो प्रश्न वास्तव मे शक्ति का ही है .
                      भीष्म पितामह का उदाहरण याद आ रहा है . जब तक वो संभल पाते, तब तक लगता है की वो कौरवों का इतना ज्यादा अन्न खा चुके थे की उनकी बुद्धि 'भ्रष्ट' हो गयी थी. ये बात उन्होंने द्रौपदी को अपने अंतिम समय मे बताई भी थी. आप सोचिये की उनके जैसा चरित्रवान, भक्त और तेजस्वी व्यक्ति भी किसी खोखले प्रण की खातिर, पता नहीं किस मजबूरी मे एक अबला की इज्जत की रक्षा करने से पीछे हट गए व अधर्म के पक्ष मे युद्ध किया शायद कौरवों के अन्न की शक्ति जिसे वो हमेशा लेते रहे हों, उसमे संचित अवगुणों ने उनकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी हो .जब भीष्म पितामह जैसे उच्च कोटि के व्यक्ति का यह हाल हो सकता है तो सामान्य व्यक्ति की क्या गिनती. अतः हमें अपने सत्संस्कारों को मजबूत आधार देना होगा ताकि कुसंस्कार रूपी कोई भूचाल हमारे संस्कारों की जड़ें न उखाड़ सके . खुद को इतना मजबूत बना लेना होगा की हमारे नजदीक आकर दुर्गुणों से युक्त व्यक्ति भी गुणों से युक्त होने लगे और उसके दुर्गुणों का हमारे ऊपर अल्प से अतिअल्प असर हो .क्योंकि हम जिस दुनिया मे रहते है, वो स्वयं ही एक काजल की कोठरी से कम नहीं है, और सयानों के लिए भी यहाँ एक लीक काजर की लगना कोई असामान्य बात नहीं.

2 comments:

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