Monday, 28 June, 2010

जीना सिर्फ किसके लिए

                  अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जियो- जरा इस सिद्धांत के विषय मे सोचते हैं.  क्या कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो सिर्फ अपने लिए ही जीता हो ? क्या सिर्फ   अपने लिए जीना निरपेक्ष रूप से संभव है ?
                 हम सब सृष्टि के अंग हैं. समस्त सृष्टि ,जिसे हम ब्रह्माण्ड का नाम दे सकते  हैं, के विभिन्न अवयव एक दुसरे से जुडे हुए हैं .हम हिमालय पर्वत की घाटी मे रहकर भी किसी मंत्र का उच्चारण करें या किसी अपशब्द का , वही   शब्द, वही   उच्चारण वापस लौटकर हमारे पास  प्रतिध्वनि के रूप मे पहुँचती है . वो आवाज एक तरंग बनकर जाने कहाँ-कहाँ तक पहुँच जाती होगी और न जाने कितनों पर प्रभाव डालती होगी. हम सब के तार एक दुसरे से जुड़े हुए हैं.  सृष्टि ने, प्रकृति ने हमारी सीमायें नियत कर रखी हैं. हम सिर्फ और सिर्फ अपने लिए कुछ नहीं कर सकते क्योंकि  जो कुछ भी हम करते हैं, उसके प्रभाव को हम पूर्ण रूप से नियंत्रित नहीं कर सकते. जरुरी नहीं की हम जो कुछ करते हैं, उसका प्रभाव सिर्फ हम पर पडे. उसका प्रभाव कहीं न कहीं दूसरों पर पड़ता ही है. लोग सिगरेट पीते हैं, उसका दुष्प्रभाव उन पर तो पड़ता ही है, साथ ही साथ निकट बैठे लोग भी उस से प्रभावित होते हैं. किसी फैक्ट्री से कोई जहरीली गैस का रिसाव होता है  और हजारों लोग प्रभावित होते हैं. तो क्या इस से ये साबित नहीं होता की कोई कर्म ऐसा नहीं है जो सिर्फ और सिर्फ स्वयं के लिए हो या सिर्फ और सिर्फ  दूसरों के लिए.  प्रभाव तो समष्टि पर पड़ता है, प्रभाव एक व्यक्ति तक सीमित  नहीं रहता .
                  यहाँ यह भी ध्यान रखना जरुरी है की हम जो करते हैं,  उसका प्रभाव सिर्फ हमारे अपने लोगों या अपनी पीढ़ी तक ही सीमित  नहीं रहता बल्कि आगे आने वाली पीढियां तक हमारे कार्यों से प्रभावित हो जाती हैं. जवाहरलाल नेहरु , धीरुभाई अम्बानी आदि के कार्यों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ रहा है. कहा जाता है की गर्भावस्था के दौरान माँ  के व्यक्तित्व व कृतित्व का प्रभाव तो उसके अजन्मे बच्चे पर भी पड़ता है . हम अपने कर्मों के द्वारा न सिर्फ स्वयं का बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भी भविष्य निर्मित करते हैं. सामान्यतः  एक धनी , प्रभावशाली व्यक्ति के बच्चों और गरीब नौकर के बच्चों के रहन-सहन, आचार-विचार , बुद्धि-कौशल , संस्कार, वातावरण मे कितना बड़ा अंतर दीखता है - कितना बड़ा, जरा सोचिये तो सही. ये अंतर उनके पालकों और  पूर्वजों के कर्मों के द्वारा ही तो उत्पन्न किया गया है . यदि संयोगवश गरीब घर का लड़का अमीर के  घर मे पैदा हुआ होता, और अमीर घर का लड़का गरीब घर मे, तो मात्र इतने से ही स्थितियां बहुत हद तक बदल जाती
                अस्तु, मेरा मानना यह है की एक व्यक्ति का कार्य सिर्फ उसके समकालीन व्यक्तियों पर ही नहीं, अपितु भविष्य मे होने वाले  व्यक्तियों पर भी प्रभाव उत्पन्न करता है . मैं मानता हूँ की इंसान सदैव सिर्फ और सिर्फ  अपने लिए कुछ नहीं कर सकता, वह  दूसरों के लिए भी चाहे -अनचाहे, जाने-अनजाने  कुछ न कुछ करते ही रहता  है.
          अब मुझे लगता है की हमें सतर्कता से सोच-विचारकर विवेक का आश्रय लेते हुए कर्म करने की सलाह क्यूँ दी जाती है? हम अपने कर्मों के लिए जिम्मेदार हैं, सिर्फ अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी. इसलिए हमारा कर्त्तव्य है की हम विवेकयुक्त होकर, तर्क और भावना का समुचित उपयोग  करते हुए कार्य करें जिस से हमारा और दूसरों का- दोनों का ही भला हो .
              जब हमारे कार्यों का लोगों पर कुछ न कुछ असर होना ही है, तो क्यों  न हम ऐसे कार्य करें जिसका लोगों पर  सकारात्मक असर हो.  नकारात्मक विचारों का स्त्रोत बनने की बजाय क्यूँ न सकारात्मक विचारों का स्त्रोत बने. गीता मे कहा गया है - योगः कर्मसु कौशलम - कर्मों को कुशलता से करने का नाम ही योग है . गीता मे ये भी कहा गया है की  गहना कर्मणो  गतिः - कर्म की गति बहुत ही गहन है. ये दोनों बातें बताती  है की 'समुचित समय मे समयोचित कर्म करना कितना मुश्किल होता है. जिसने इस रहस्य को समझ लिया, शायद उसने जीवन मे सब कुछ पा लिया ,पर इस रहस्य को पूर्ण रूप से शायद ही कोई जान पाया हो . 'विवेकयुक्त निष्काम कर्मयोग' के माध्यम से ही शायद हम अपना और अपने लोगों का भला कर पायें . इसका अर्थ यही है की कर्म करने के पूर्व हम अपने तर्क, भावना व विवेक के जरिये उसकी उपयुक्तता की परख करें, और इसके बाद हम अपने और सबके हित के लिए जो उचित प्रतीत हो, वह कार्य  करें.
                           हम अपने  निजी हितों के साथ-साथ समष्टिगत हितों का भी ध्यान रखें, समष्टिगत हितों के साथ-साथ निजी हितों का भी ध्यान रखें. अपने व्यक्तित्व व कृतित्व मे संतुलन बनाये रखें . न अपने साथ नाइंसाफी करें, न किसी और के साथ , क्यूंकि नाइंसाफी आखिर नाइंसाफी है - चाहे अपने साथ हो या किसी और के साथ.   उचित यही होगा कि  ''अपने और सबके हित के लिए   है जो बेहतर से भी बेहतर , उस समष्टि हित हेतु हम  सब कार्यरत रहे प्रतिपल होकर  तत्पर ''.         

1 comment:

  1. ummid ke mutabik. yah sab karm sahaj swabhavik hota rahe, vichar ke parinam ka anusaran matr nahi, tabhi sarthak hoga. achchhe post ke liye badhaiya.

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